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मनमीत

 
मनमीत हो इक मीत सा,
अनकही इक प्रीत सा।
लब जरा हिले नहीं, शब्द भी मिले नही।
हृदय में उतरता वो, मंद-मंद गीत सा।।

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ना कही कुछ भी बात,
जाने वो मेरे सब दिन-ओ-रात।
मन को मिला ना कोई,
हो जो मन का इक मीत सा

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पढ़ ले जो ख़ुश्बुओं के खत
जिसे पाकर लगे
हो इक हार में, वो जीत सा
मनमीत हो इक मीत सा...

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कह सकूँ मैं..
कह सकूँ मैं जिससे सारी बात ।
हुई जो उनसे मुलाकात,
मुख़्त
र सी गुजरी पूरी रात
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बातों का समंदर
है सीने में समाया।
मुमकिन है कि ना हो...
इक भी लफ़्ज़ की मुलाकात ।।

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 मनमीत हो इक मीत सा
अनकही इक प्रीत सा...

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 दर्द महसूस हो मेरा उसको भी
बिन कहे ही जान ले
कहने को हो ना कोई बात
कभी हो जो मुलाकात।

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सतगुरू शर्मा 
28 अगस्त 2017

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