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उसकी वो बोलती आँखें,
ख़ामोश जुबां मे जाने क्या—क्या कह गयीं
कि मचल उठे जज्बात
जागी कलम और
अल्फाज कागज पर बिखर गये।

सतगुरू शर्मा

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