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बारिश सा बरसते तुम



बूंद बन बारिश कि, बरसते तुम,

याद के मानिंद आहिस्ता-आहिस्ता 

झिर-झिर हम-पर झरते तुम।

भीग जाता मैं...2 

जऱरा-जऱरा, कतरा-कतरा

ना तरसता और..

जब बूंद बन, बरसते तुम ।।


मेरे चेहरे पर मोतियों से...

गिरते और सरकते तुम।

काश! के इस भीगे सावन में

बारिश सा बरसते तुम।।


महसूस करता हूँ तुझको

बूंदों से लिपट कर।

काश कि भादों बन

हम पर ही झरते तुम।।


ना ज़माने कि परवाह है मुझको

लोग क्या कहेंगें, क्या कहेगा ज़माना

चूम लेता सरेबाज़ार मै तुमको,

जब मेरे होठो से गुज़रते तुम।


काश! कि बूंद बन कर बरसते तुम।


SatGuru Sharma

15/09/2021

ऐ जिंदगी! हर मोड़ पर तूने छला...



ऐ जिंदगी! क्यों?
क्यों मुझको, हर मोड़ पर तूने छला।
आया था उज़ालों की ख़्वाहिशें  ले कर,
आखि़री सफ़र तक मुझको अंधेरा मिला।।

ऐ जिंदगी! मुझको हर मोड़ पर तूने छला...

क्या ख़ता थी मेरी,
कि सबकी खुशी चाही मैनें,
मेरी खुशियों कि चाह रखने वाला
उम्र गुज़री पर एकभी ना मुझको मिला ।

ऐ जिंदगी! मुझको हर मोड़ पर तूने छला...

सावन की झीनी फुहार समझ
ऐ जिंदगी! तुझको गले लगा बैठा
वक़्त से जो नज़र मिलायी,
काँटों का इक हार मिला।

ऐ जिंदगी! मुझको हर मोड़ पर तूने छला...

सतगुरु 13/09/19

.....पर तुम ना आए


सावन आया पर तुम ना आए 
बरखा आई घनघोर घटा लाई
पर...
पर तुम ना आए

सावन बरसा.. झूम-झूम कर 
मन मयूर तरसा, घूम घूम कर 
भीगा घर-आंगन और भीगा है तन 
सूखा था... सूखा रह गया, मेरा प्यासा मन 

सावन आया पर तुम ना आए 
नयनो ने नीर, खूब बरसाए 
बादल गरजे; हमें डराऐ
सावन आया पर तुम ना आए 

यादों के बादल हम पर ही 
बरस-बरस जाए 
सावन आया 
पर तुम क्यों ना आए??

सतगुरु
०३ / ०८ / २०१९

बाबा की बिटिया


बाबा की मैं प्यारी बिटिया,
घर की मैं नन्हीं सी चिड़िया,
मुझसे ही गुलजार था अंगना,
फिर क्यों भेजा अंजाने संग,
कह कर अब, तेरा है सजना,

मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 1

हम सब हुए पराये अब,
हुआ पराया घर ये अंगना।
घर सजना का तेरा है अब,
बोली माँ पहनाकर कंगना।।

मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 2

नाजु़क कंधों पर बोझ बड़ा था,
कमर पे चाभी का एक कड़ा था।
बचपन अब मैं छोड़ आयी थी,
घर-घरौंदे, खेल-खिलौने
सब के सब मैं तोड़ आयी थी।

मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 3 

माँ-बाबा पर रोष बड़ा था,
मन कच्ची-मिट्टी का एक घड़ा था।
याद में आँसू बहते थे,
बह-बह कर मुझसे कहते थे।

मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 4

धीरे-धीरे वक़्त भी गुजरा,
साजन का घर अब, मेरा था।
बाबुल का घर रैन-बसेरा,
सजन घर रोज सबेरा था।।

मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 5

मुझको भी मिल गयी थी अब,
मेरे आंगन की चुन-मुन चिड़िया।
वह भी थी, बाबा की गुड़िया
घर भर की खुशियों की पुड़िया।

मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 6

बचपन मेरा लौट आया था,
वक़्त ने मुझको समझाया था।
जीवन के पल-पल को जीना
अनुभव दरपन दिखलाया था।। 

मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 7 


सतगुरू शर्मा

29-09-2018

भीगा सावन



बाहर बरखा बरस रही है,
अंदर सूखा सावन है।
मन की बात समझे ना
जो मेरा मनभावन है।।

बाहर झिर-झिर झिरता सावन,
मान का ताप बढ़ाए है।
टिप-टिप बारिश की बूंदें,
विरह का राग सुनाए है।।

गरज-गरज कर, बरस-बरस कर;
जो तुमको पास हमारे लाए थे।
वही है मेघा वही है बिजली,
क्यों रह-रह कर हमें डराये रे।।

बूंदों का अब रुख पे गिरना,
याद पुरानी लाए है।
टूट-टूट कर दिल ये रोता
पल-पल तुम्हे बुलाए है।।

सतगुरू शर्मा
03.08.2018

एक सपना मीठा सा...


आँखों के गीले कोरों से 
आज कुछ यादें बह निकलीं,
कि आज फिर पुराने दिनों की याद में
दिल भर आया,

यह सख़्त और मजबूत इंसान
आज फिर बच्चा बनके
लिपट माँ से खूब रोया,

कि आज फिर बरसो बाद 
उसकी हथेली ने मेरे माथे को चूमा,
और सब..
और सब उलझनों को भूल
आज फिर मैं सुकून से सोया,

पुराने बक्से में बंद 
मेरे बचपन का खिलौना..
क्या निकला!
कि मेरा बचपन मेरे अंदर से झाँकने लगा 
जिसे मैं बहुत पीछे छोड़ आया,
आज फिर वह बचपन लौट आया,

माँ के हाथों की खीर खाकर
वही स्वाद वही लज़्जत ...
शायद मेरा बचपन ...

इक आहट और सपना टूटा!!!
मगर आँखों के किनारे अब भी गीले थे
कि बचपन की ख़ुश्बू से
अब भी मेरा मन महक रहा था।

एक सपना मीठा सा...

सतगुरू शर्मा

इक तरफ वो है, इक तरफ हम...


इक तरफ वो है, 
इक तरफ हम...2
वो बेवफ़ा होकर खुश!
हम बावफ़ा आँख नम।।

इक तरफ वो है, इक तरफ हम...

वो भूल बैठा है हमको, 
जो कभी था मेरा सनम।
उसकी हर भूल को नादानी समझ बैठे,
उस बेवफ़ा यार में थी थोड़ी वफ़ा कम।।

इक तरफ वो है ...

कितना वक़्त गुज़रा ...2
मगर यादों से ना निकल पाये हम,
उजड़ी मुहब्बत के दयारों में भी
यादों के दीप जलाए हम।

इक तरफ वो है ...

मेरी मुहब्बत का सिला 
मुझको ठोकरों से ही मिला,
मेरी मुहब्बत बेवफा हो गयी
है रब़ से मुझको इतना सा गिला।

इक तरफ वो है ...

माना की आज तू,
सिक्कों में तुली है।
ये खुशियाँ है चंद लम्हों की,
किसको उमर भर मिली हैं।

इक तरफ वो है ...

ठुकरा कर मेरी पाक मुहब्बत,
ये जो तूने दौलत पाई है।
मुहब्बत खुदा की नेमत है
जो नादानी से ठुकराई है।।

इक तरफ वो है ...

ना सुकूं रहेगा 
ना चैन पायेगी,...2
मगर मेरे प्यार की खुश्बू..2 
ताकयामत फ़िज़ा से आयेगी।

इक तरफ वो है ...

मेरा क्या है? मेरे साथ,
तेरी मुहब्बत का साया है।
मिली किसेे यहाँ सच्ची मुहब्बत?
कौन है जो इसको पाया है?

इक तरफ वो है ...

©सतगुरू शर्मा