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ऐ मेरी जिंदगी! मैनें देखा है तुझको....
ऐ मेरी जिंदगी
मुझे है ये यकीं
तू मिलेगी मुझको
बस यूं ही कहीं
कि मैनें देखा है तुझको
फूलों में हंसते, बरखा में बरसते
सूखी माटी में पानी की
इक बूंद को तरसते हुए
ऐ मेरी जिंदगी!
मैनें देखा है तुझको....
टूटे आशियानों में सिसकते हुए
बेबस निगाहों से रिसते हुए
ऐ मेरी जिंदगी!
मैनें देखा है तुझको....
सुबह के इंतजार में,
रात को पल-पल ढ़लते हुए
नदिया की धार में, लोगो के प्यार में
कल-कल बहते हुए
ऐ मेरी जिंदगी!
मैनें देखा है तुझको....
शहनाइयों के शोर में
सिसकियों को घुटते हुए,
कुछ बनते हुए, कुछ बिगड़ते हुए,
पल-पल बदलते, रिश्तों के दौर में
ऐ मेरी जिंदगी!
मैनें देखा है तुझको....
यादों के धुएँ को फ़िज़ा में...2
अहिस्ता-अहिस्ता घुलते हुए।
ऐ मेरी जिंदगी!
मैनें देखा है तुझको....
सतगुरू शर्मा
12/09/2022
‘शाम हो गई।’
कि अभी सूरज उगा था,
कि अभी शाम हो गई।
मज़िल कि ओर बस चला ही था
कि पहले ही पड़ाव पे शाम हो गई
रिश़्तोें कि कलियां खिली हीं थीं
कि ढ़ल गया प्यार और....
शाम हो गई।
कि अभी कुछ ही दिन तो हुए थे
तुमसे मिले ....2
इतनी भी क्या जल्दी थी? कि यूं...
तुम हम को छोड़ चले?
अभी तो कुछ कहा भी नही
अभी तो कुछ सुना भी नही
चंद बातें क्या हुई दऱमयां
कि मुलाकात की शाम हो गई
बुझने लगें हैं अब, निगाहों के चराग़ भी
लगता है कि जिंदगी की शाम हो गई
कि एक शाम वो भी थी... 2
जब तुम मेरे साथ थे
दरवाजे़ं पे ठहरी निगाहें पूछती है तुम्हारा पता
कि तेरे आने से पहले ही शाम हो गई
सोचता हूं कि
लोग जीते है खुद के वास्ते
मग़र देखते ही तुम्हें
जिंदगी तेरे नाम हो गई।
कि इस कद़र गुज़री है कमबख़्त जिंदगी
अभी दिन निकला कि अभी शाम हो गई।।
सतगुरू
27.11.2021
बारिश सा बरसते तुम
बूंद बन बारिश कि, बरसते तुम,
याद के मानिंद आहिस्ता-आहिस्ता
झिर-झिर हम-पर झरते तुम।
भीग जाता मैं...2
जऱरा-जऱरा, कतरा-कतरा
ना तरसता और..
जब बूंद बन, बरसते तुम ।।
मेरे चेहरे पर मोतियों से...
गिरते और सरकते तुम।
काश! के इस भीगे सावन में
बारिश सा बरसते तुम।।
महसूस करता हूँ तुझको
बूंदों से लिपट कर।
काश कि भादों बन
हम पर ही झरते तुम।।
ना ज़माने कि परवाह है मुझको
लोग क्या कहेंगें, क्या कहेगा ज़माना
चूम लेता सरेबाज़ार मै तुमको,
जब मेरे होठो से गुज़रते तुम।
काश! कि बूंद बन कर बरसते तुम।
SatGuru Sharma
15/09/2021
ऐ जिंदगी! हर मोड़ पर तूने छला...
ऐ जिंदगी! क्यों?
क्यों मुझको, हर मोड़ पर तूने छला।
आया था उज़ालों की ख़्वाहिशें ले कर,
आखि़री सफ़र तक मुझको अंधेरा मिला।।
ऐ जिंदगी! मुझको हर मोड़ पर तूने छला...
क्या ख़ता थी मेरी,
कि सबकी खुशी चाही मैनें,
मेरी खुशियों कि चाह रखने वाला
उम्र गुज़री पर एकभी ना मुझको मिला ।
ऐ जिंदगी! मुझको हर मोड़ पर तूने छला...
सावन की झीनी फुहार समझ
ऐ जिंदगी! तुझको गले लगा बैठा
वक़्त से जो नज़र मिलायी,
काँटों का इक हार मिला।
ऐ जिंदगी! मुझको हर मोड़ पर तूने छला...
सतगुरु 13/09/19
.....पर तुम ना आए
सावन आया पर तुम ना आए
बरखा आई घनघोर घटा लाई
पर...
पर तुम ना आए
सावन बरसा.. झूम-झूम कर
मन मयूर तरसा, घूम घूम कर
भीगा घर-आंगन और भीगा है तन
सूखा था... सूखा रह गया, मेरा प्यासा मन
सावन आया पर तुम ना आए
नयनो ने नीर, खूब बरसाए
बादल गरजे; हमें डराऐ
सावन आया पर तुम ना आए
यादों के बादल हम पर ही
बरस-बरस जाए
सावन आया
पर तुम क्यों ना आए??
सतगुरु
०३ / ०८ / २०१९
बाबा की बिटिया
बाबा की मैं प्यारी बिटिया,
घर की मैं नन्हीं सी चिड़िया,
मुझसे ही गुलजार था अंगना,
फिर क्यों भेजा अंजाने संग,
कह कर अब, तेरा है सजना,
मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 1
हम सब हुए पराये अब,
हुआ पराया घर ये अंगना।
घर सजना का तेरा है अब,
बोली माँ पहनाकर कंगना।।
मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 2
नाजु़क कंधों पर बोझ बड़ा था,
कमर पे चाभी का एक कड़ा था।
बचपन अब मैं छोड़ आयी थी,
घर-घरौंदे, खेल-खिलौने
सब के सब मैं तोड़ आयी थी।
मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 3
माँ-बाबा पर रोष बड़ा था,
मन कच्ची-मिट्टी का एक घड़ा था।
याद में आँसू बहते थे,
बह-बह कर मुझसे कहते थे।
मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 4
धीरे-धीरे वक़्त भी गुजरा,
साजन का घर अब, मेरा था।
बाबुल का घर रैन-बसेरा,
सजन घर रोज सबेरा था।।
मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 5
मुझको भी मिल गयी थी अब,
मेरे आंगन की चुन-मुन चिड़िया।
वह भी थी, बाबा की गुड़िया
घर भर की खुशियों की पुड़िया।।
मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 6
बचपन मेरा लौट आया था,
वक़्त ने मुझको समझाया था।
जीवन के पल-पल को जीना
अनुभव दरपन दिखलाया था।।
मुझसे ही गुलजार था अंगना ... ... ... 7
सतगुरू शर्मा
29-09-2018
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सुनहरी सुबह का इंतज़ार झिलमिल चमकती किरणें झरोखों से कमरे के अंदर झाँकती है, आहट पाते ही अंधेरा चोरों की तरह मुँह छिपाकर घर के पीछवाड...






